Tuesday, October 5, 2010
मीर तक़ी 'मीर'
शायर को खुदा का शिष्य भी कहा गया है और शायरी को पैगम्बरी का हिस्सा, लेकिन 'मीर' अकेले शायर हैं, जिन्हें खुदा-ए-सुखन कहा जाता है ! वर्तमान उत्तर प्रदेश के आगरा ( तत्कालीन अकबराबाद ) में 1722 के किसी रोज़ जन्मे 'मीर' हिन्दुस्तानी काव्य-जगत के उन चन्द नामों में शुमार हैं, जिन्होंने सदियों बाद भी लोगों के दिल-ओ-दिमाग में स्थान बनाया हुआ है ! उनकी शायरी उर्दू-हिंदी की साझा सांस्कृतिक विरासत का ऐसा विरल उदाहरण है, जिसे लोकोन्मुख कथ्य और गंगा-जमुनी अंदाज़ के साथ पूरी कलात्मक ऊंचाई का आईना भी कहा जा सकता है ! 'मुझे गुफ्तगू अवाम से है' - कहते हैं 'मीर' और यही है वह सचाई, जिसकी बदौलत उनका कलाम दरियाओं में जाने कितना पानी बह जाने के बावजूद आज भी वही असर रखता है ! लुत्फ़ लें उनकी एक बेइंतहा पुरअसर ग़ज़ल का-
देख तो दिल कि जां से उठता है
ये धुंआ सा कहां से उठता है
गोर किस दिलजले की है ये फलक
शोला इक सुब्ह यां से उठता है
खानः-ए-दिल से जीनहार न जा
कोई ऐसे मकां से उठता है
बैठने कौन दे है फिर उन को
जो तिरे आस्तां से उठता है
यूं उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहां से उठता है
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गोर - कब्र, फलक - आकाश, खानः-ए-दिल - ह्रदय का घर, जीनहार - हरगिज़, कतई; आस्तां - चौखट, दरवाज़ा !
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