Sunday, October 10, 2010

ऐन सलाम

सैयद अब्दुस्सलाम बुखारी उर्दू अदब के संसार में ऐन सलाम के नाम से जाने जाते हैं ! 1929 में जन्मे ऐन सलाम की नज्में आज़ाद हैं और गज़लें पुरसोच !
मुलाहिजा फरमाएं एक नज़्म -


बरसती रात का जादू

बरसती रात की तन्हाइयों में
फ़ज़ा में बिजलियां यूं तिलमिलाईं
मुझे महसूस कुछ ऐसा हुआ, तू
मेरी आग़ोश में सिमटी हुई है !


उनकी शैली पर फ़ारसीयत की छाप है, पर शऊर में आधुनिक मनोविज्ञान है ! वे बलोची और पश्तो लोकगीतों को उर्दू में लाने के लिए बहुप्रशंसित हुए हैं ! उनके दो संकलन 'बलोची लोकगीत' और 'पश्तो लोकगीत' शाया हुए ! 'चकीदा' और 'चांद आईने में' उनकी शायरी के संग्रह हैं ! आइए, अब रू-ब-रू हों उनकी पुरसोच ग़ज़ल के एक नमूने से -



मैं इधर चुप हूं आप उधर चुप हैं
दोनों मजरूह हैं, मगर चुप हैं

किस क़यामत का सामना है कि आज
अहले-फ़रियाद इस क़दर चुप हैं

जो तेरी खोज में थे नग्मा-तराज़
जाने क्यों तुझको ढूंढ कर चुप हैं

अपनी वुसअत में खो गए होंगे
तेरे आशुफ्ता-सर अगर चुप हैं

आमदे-इंक़िलाब - क्या कहिए
चुप हैं अफ़लाक, बामो-दर चुप हैं

कुछ तो कहिए कि बात क्या है सलाम
आप क्यों आज इस क़दर चुप हैं

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अहले-फ़रियाद
: दुहाई देने वाले, नग्मा-तराज़ : गाने वाले, वुसअत : विस्तार, आशुफ्ता-सर : प्रेमी, आमदे-इंक़िलाब : इंक़िलाब (क्रान्ति) का आना, अफ़लाक : संसार, बामो-दर : खिड़कियां और दरवाज़े

'शाहिद' मीर

रियासत टोंक में 1949 की 10 फरवरी को जन्मे शाहिद मीर खां उर्दू अदब में 'शाहिद' मीर के नाम से पहचाने जाते हैं ! हिंदी-उर्दू में समान दक्षता से ग़ज़ल कहने वाले 'शाहिद' का लहज़ा सूफ़ियाना और तर्ज़ सादा है, यही वज़ह है कि उनका क़लाम पहले परिचय में ही पाठक को अपना बना लेता है ! 'मौसम ज़र्द गुलाबों का' और 'कल्पवृक्ष' उनके बहुचर्चित काव्य संकलन हैं ! पहले संग्रह के लिए वे राजस्थान एवं बिहार उर्दू अकादमी तथा ग़ालिब अकादमी, बंगलौर से सम्मानित हो चुके हैं ! आइए, रू-ब-रू हों उनकी एक बेहतरीन ग़ज़ल से -


पढ़-लिख गए तो हम भी कमाने निकल गए
घर लौटने में फिर तो ज़माने निकल गए

घिर आई शाम हम भी चलें अपने घर की ओर
पंछी भी अपने-अपने ठिकाने निकल गए

बरसात गुज़री सरसों के मुरझा गए हैं फूल
उनसे मिलन के सारे बहाने निकल गए

पहले तो हम बुझाते रहे अपने घर की आग
फिर बस्तियों में आग लगाने निकल गए

खुद मछलियां पुकार रही हैं कहां है जाल
तीरों की आरज़ू में निशाने निकल गए

किन साहिलों पे नींद की परियां उतर गईं
किन जंगलों में ख्वाब सुहाने निकल गए

'शाहिद' हमारी आंखों का आया उसे ख्याल
जब सारे मोतियों के खजाने निकल गए

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आरज़ू : आकांक्षा, साहिल : तट, किनारा

Saturday, October 9, 2010

शीन काफ़ निज़ाम

जोधपुर (राजस्थान) में 26 नवम्बर 1947 को जन्मे शीन काफ़ निज़ाम एक दर्द आशना दिल के मालिक हैं ! बहुत कम उम्र में एहसास की विशाल दौलत से मालामाल हुए कवि के रूप में उर्दू जगत में उन्हें एक उच्च और सम्मानित स्थान हासिल है ! 'लम्हों की सलीब', साया कोई लंबा न था', 'दश्त में दरिया', 'सायों के साये में' देवनागरी में और 'नाद', 'बयाजें खो गई हैं' (कविता), 'लफ्ज़ दर लफ्ज़' (आलोचनात्मक लेखों का संग्रह) उर्दू में शाया हुए ! उर्दू के बहुचर्चित काव्य संकलनों 'शीराज़ा' और 'मेयार' में शामिल किए गए ! मंटो की कहानियों पर विशेष अध्ययन उर्दू में शाया हुआ ! राजस्थान उर्दू अकादमी के सर्वोच्च सम्मान 'महमूद शीरानी पुरस्कार' से नवाजे गए ! यहां पढ़ें उनकी एक खूबसूरत ग़ज़ल -


मौजे-हवा से फूलों के चेहरे उतर गए
गुल हो गए चिराग़ घरौंदे बिखर गए

पेड़ों को छोड़कर जो उड़े उनका जिक्र क्या
पाले हुए भी ग़ैरों की छत पर उतर गए

यादों की रुत के आते ही सब हो गए हरे
हम तो समझ रहे थे सभी ज़ख्म भर गए

हम जा रहे हैं टूटते रिश्तों को जोड़ने
दीवारो-दर की फ़िक्र में कुछ लोग घर गए

चलते हुओं को राह में क्या याद आ गया
किसकी तलब में क़ाफ़िले वाले ठहर गए

जो हो सके तो अबके भी सागर को लौट आ
साहिल के सीप स्वाति की बूंदों से भर गए

इक एक से ये पूछते फिरते हैं अब 'निज़ाम'
वो ख्वाब क्या हुए, वो मनाज़िर किधर गए

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मौजे-हवा : हवा की लहर, रुत : ऋतु, मौसम; दीवारो-दर : दीवार और दरवाज़ा, तलब : इच्छा, साहिल : किनारा, तट; मनाज़िर : मंज़र का बहुवचन, दृश्य !

'हसन' कमाल

लखनवी सरजमीं पर 1943 में जन्मे 'हसन' कमाल एक शायर के रूप में जितने जाने जाते हैं, उतनी ही बड़ी पहचान उन्हें फ़िल्मी गीतकार और टीवी शख्सियत के रूप में हासिल है ! 'हसन' अपनी शायरी में अपने दौर की बात करते हैं, लेकिन उसमें आप गुज़रे ज़माने की झलक और आने वाले कल की आहटें भी साफ़ महसूस कर सकते हैं ! मशहूर लखनवी नज़ाकत का असर उनकी शख्सियत में भले हो, उनकी शायरी कटु यथार्थ से भी दिल खोल कर रू-ब-रू होती है ! इसके बावजूद इस मुठभेड़ का 'हसन' का अपना अंदाज़ है, निहायत ही निजी अंदाज़ ! आइए, हम भी शिरकत करें 'हसन' कमाल के इस निहायत निजी, लेकिन सर्वकालिक और सार्वजनीन संसार में -



किरनों का जाल फेंका, उठा ले गई मुझे
इक धूप रूप की थी, उड़ा ले गई मुझे

पत्थर बना तो ज़द पे रहा ठोकरों की मैं
जब खाक़ हो गया, तो हवा ले गई मुझे

मैं शोरो-गुल से शहर के घबरा चला था कुछ
खामोशियों की एक सदा ले गई मुझे

यूं भी पड़ा हुआ था मैं बिखरी किताब सा
फिर कई हवा का दोष उड़ा ले गई मुझे

साहिल पे दर्द के मैं उसे ढूंढता रहा
वो मौज बन के आई बहा ले गई मुझे

कल तक मैं अपने आप में मौजूद था मगर
उसकी निगाह मुझसे चुरा ले गई मुझे

आवारगी लिखी थी मुक़द्दर में जब 'हसन'
मैं भी गया जिधर ये सबा ले गई मुझे

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ज़द : निशाना, लक्ष्य; सदा : ध्वनि, आवाज़; मौज : लहर, सबा : प्रातःकालीन शीतल हवा !

'होश' तिर्मज़ी

अम्बाला के साढोहरा में 1941 में जन्मे सैयद सिब्ते हसन उर्दू काव्य संसार में 'होश' तिर्मज़ी के नाम से मशहूर हैं ! 'होश' की शायरी एक ओर जहां ठेठ रिवायती ख़ाके में ढली नज़र आती है, वहीं दूसरी ओर वे उर्दू अदब की ताज़ा मौज़ों पर सवार भी दिखाई देते हैं ! यही वज़ह है कि वे शायरी में परम्परागत अल्फ़ाज़, बिंब और प्रतीकों का प्रयोग बहुतायत से करते हैं, लेकिन इसके बावजूद अपने क़लाम को कठिन चीज़ों से बड़े कौशल से बरी भी रखते हैं यानी उनके क़लाम में आमफहम बनाए रखने के मंसूबे साफ़ देखे जा सकते हैं ! कहा जा सकता है कि 'होश' की शायरी में, विशेषकर ग़ज़लों में एक पूरी रिवायत सांस लेती महसूस की जा सकती है ! आइए, महसूस करें ऐसी ही एक खूबसूरत और सादालफ्ज़ ग़ज़ल की पुरअसर खुशबू -


देखे हैं जो ग़म दिल से भुलाए नहीं जाते
इक उम्र हुई याद के साए नहीं जाते

अश्कों से खबरदार कि आंखों से न निकलें
गिर जाएं ये मोती तो उठाए नहीं जाते

हर जुम्बिशे-दामाने-जुनूं जाने-अदब है
इस राह में आदाब सिखाए नहीं जाते

हम भी शबे - गेसू के उजालों में रहे हैं
क्या कीजिए दिन फेर के लाए नहीं जाते

शिकवा नहीं, समझाए कोई चारागरों को
कुछ ज़ख्म हैं ऐसे कि दिखाए नहीं जाते

ऐ 'होश', ग़मे-दिल के चिराग़ों की है क्या बात
इक बार जला दो, तो बुझाए नहीं जाते

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रिवायत : परम्परा, किसी के मुंह से सुनी बात ज्यों की त्यों किसी से कहना, इस्लामी परिभाषा में हज़रत पैग़म्बर (हज़रत मोहम्मद सल.) के मुख से सुनी हुई बात अन्य को उन्हीं के अल्फ़ाज़ में सुनाना, हदीस बयान करना; सादालफ्ज़ : सरल शब्दों में, जुम्बिशे-दामाने-जुनूं : उन्मादग्रस्त के दामन का हिलना, जाने-अदब : शिष्टाचार की जान, आदाब : शिष्टाचार, शबे-गेसू : बालों की रात, यहां संकेत प्रेयसी की जुल्फों के सान्निध्य में रात गुज़ारने से है; चारागर : चिकित्सक, ग़मे-दिल : हृदय की पीड़ा !

उबैदुल्ला 'अलीम'

भोपाल में 1939 में जन्मे उबैदुल्ला 'अलीम' आधुनिक उर्दू शायरी के प्रतिनिधि कवि हैं ! सादा लहज़े में बड़ी गहरी बात कह जाने का कमाल उनकी क़लम को हासिल है ! इसी वज़ह से उनका ज्यादातर रचना-कर्म सदा चर्चा का विषय बनता रहा है ! ग़ज़ल की कोई नई भाषा नहीं गढ़ते हुए भी 'अलीम' ने अपने लिए नए ज़मीन-ओ-आसमान तलाशे हैं और यही एक कारण उन्हें शायरों की भीड़ में भी अलग और अकेली शख्सियत का रूतबा अता करता है ! आइए, पढ़ें 'अलीम' की एक ऐसी ही सादा अल्फ़ाज़ से बुनी, लेकिन पुरअसर ग़ज़ल -


जवानी क्या हुई, इक रात की कहानी हुई
बदन पुराना हुआ, रूह भी पुरानी हुई

कोई अज़ीज़ नहीं मासवा-ए-जात हमें
अगर हुआ है, तो यूं जिंदगानी हुई

न होगी खुश्क कि शायद वो लौट आए फिर
ये किश्त गुज़ारे हुए अब्र की निशानी हुई

तुम अपने रंग नहाओ मैं अपनी मौज उडूं
वो बात भूल भी जाओ, जो आनी-जानी हुई

मैं उसको भूल गया हूं, वो मुझको भूल गया
तो फिर ये दिल पे क्यों दस्तक़ सी नागहानी हुई

कहां तक और भला जां का हम ज़ियां करते
बिछड़ गया है तो, ये उसकी मेहरबानी हुई

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अज़ीज़ : प्रिय, मासवा-ए-जात : निज के सिवा, किश्त : खेती, अब्र : बादल, नागहानी : अकस्मात, अचानक; ज़ियां : हानि, नुकसान !

परवीन फ़ना सैयद

लाहौर में 1936 के सितम्बर माह की तीसरी तारीख को जन्मीं परवीन सैयद ने शायरी के लिए अपने इस्मे-शरीफ़ में तखल्लुस 'फ़ना' जोड़ कर उसे परवीन फ़ना सैयद बना लिया ! यहां उनके लिए अपनी जानिब से कुछ न कह, जनाब अहमद नदीम क़ासमी की टिप्पणी उद्धृत करना मुनासिब समझता हूं ! मुलाहिजा फरमाएं -"परवीन फ़ना सैयद की शायरी पाकीज़गी-ए-एहसास की शायरी है ! किसी भी मोड़ पर उन्होंने ग़ज़ल की लताफ़त और नजाकत को मज़रूह नहीं किया, बल्कि ग़ज़ल की तय की हुई रवायतों को पुख्ता किया है ! उनसे पहले खुद्दारी और गैरतमंदी की सम्त उर्दू ग़ज़ल में बहुत कम नुमायां हुई है ! वो तरक्की की तरफदार हैं, मगर हर नई शैली को आधुनिकता के नाम पर क़बूल कर लेना उन्हें मंजूर नहीं है ! चुनांचे वो प्रयोग जो आधुनिकता की फैशनेबुल नक़ल के नाम पर पॉपुलर हुए हैं, उन्हें बेचैन कर देते हैं ! बेयक़ीनी के इस बदसूरत दौर में परवीन फ़ना सैयद ने इंसानी दोस्ती से लबरेज़ शायरी की है !" 1975 के बाद से उन्होंने लिखना बहुत कम कर दिया और कभी-कभार उनका नया सृजन सामने आता है ! उनके दीवान 'हर्फ़े-वफ़ा' (1974) की सज्जा पकिस्तान के मशहूर आर्टिस्ट सादिकैन ने की, जो बहुत मकबूल हुई ! आइए पढ़ें उनकी एक बेहतरीन ग़ज़ल -


नामूसे-वफ़ा का पास रहा, शिकवा भी जुबां तक ला न सके
अन्दर से तो रोये टूट के हम, पर एक भी अश्क बहा न सके

साहिल तो नज़र आया लेकिन, तूफां में बला की शिद्दत थी
मौजों को मनाया लाख मगर, हम अपना दर्द सुना न सके

हम कहते-कहते हार गए, और दुनिया ने कुछ भी न सुना
जब दुनिया ने इसरार किया, हम अपना दर्द सुना न सके

कब हमने गुलिस्तां चाहा था, कब हमने बहारें मांगी थीं
इक गुल की तमन्ना थी हमको, वो भी तो चमन में पा न सके


और यह रुबाइयात -

गुलदान में कलियों को सजा कर देखा
हर फूल को कांटों से बचा कर देखा
उजड़ा ही नज़र आया मेरा घर - मैंने
हर सम्त को आईना घुमा कर देखा

सर है - इसे क़दमों में झुकाऊं क्योंकर
मैं हूं - मैं अना अपनी मिटाऊं क्योंकर
सच कह न सकूं तो झूट कैसे बोलूं
हर खोल पे इक खोल चढ़ाऊं क्योंकर

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पाकीज़गी-ए-एहसास : भावना की पवित्रता, लताफ़त : सूक्ष्मता, मज़रूह : घायल, रवायतों : परम्पराओं, सम्त : ओर, यहां आशय आकृति से है; जानिब : तरफ, ओर; नामूसे-वफ़ा : प्रेम की मर्यादा, पास : शील-संकोच, लिहाज़; अश्क : आंसू, साहिल : किनारा, तट; मौजों : लहरों, जानिबे-साहिल : किनारे की तरफ, इसरार : हठ, जिद; गुलिस्तां : उपवन, बाग़; गुल : फूल, चमन : उपवन, बाग़; आईना : दर्पण, अना : मैं अथवा स्व का भाव, अस्तित्व !